ममता की TMC टूटी, 58 विधायकों ने अलग गुट बनाया:ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुना, स्पीकर ने मंजूरी भी दी

ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) में 28 साल के इतिहास में पहली बार औपचारिक तौर पर टूट सामने आई है। बुधवार को 58 बागी विधायकों ने पार्टी से निकाले गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना। विधानसभा स्पीकर रथींद्र बोस को समर्थन पत्र दिया। इसमें मांग की गई कि ऋतब्रत को नेता विपक्ष घोषित किया जाए। न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, स्पीकर ने मंजूरी दे दी है। उन्हें विधानसभा में नेता विपक्ष का रूम भी अलॉट कर दिया गया है। जावेद खान, संदीपन साहा और सिउली साहा को उपनेता जबकि अखरुज्जमान को चीफ व्हिप बनाया गया है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम पर अभी विधानसभा स्पीकर और ममता बनर्जी का कोई बयान नहीं आया है। ममता के पास अब 22 विधायकों का समर्थन है। TMC ने 294 सीटों में से 80 सीटें जीती थीं। यह विवाद उस समय शुरू हुआ, जब नेता विपक्ष चुनने के प्रस्ताव पर फर्जी साइन का आरोप लगाने के बाद ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से बाहर कर दिया गया था। इसी बीच सीनियर लीडर कुणाल घोष ने बताया कि TMC विधायक फिरहाद हकीम ने कोलकाता के मेयर पद से इस्तीफा दे दिया है। ऋतब्रत ने शुभेंदु अधिकारी को धन्यवाद दिया, 5 बड़ी बातें… बागी गुट ने अपने पत्र में ममता बनर्जी को अब भी पार्टी अध्यक्ष बताया है। लेकिन अभिषेक बनर्जी का नेतृत्व और विधायक दल से जुड़े फैसलों को मानने से इनकार किया है। TMC में आगे क्या होगा, 4 सवाल-जवाब से समझिए सवाल 1 : विधानसभा में असली दल कौन है, यह कैसे तय होगा? जवाब: विधायक दल और राजनीतिक पार्टी अलग-अलग चीजें हैं।‌ - स्पीकर केवल विधानसभा के भीतर विधायक दल के नेता और व्हिप को मान्यता देते हैं। - राजनीतिक पार्टी पर कोई फैसला नहीं ले सकते है। चुनाव आयोग और कोर्ट इसे तय करता है। सवाल 2: संगठन पर किसका नियंत्रण होगा? जवाब: जब तक चुनाव आयोग कुछ और फैसला न करे: - ममता बनर्जी पार्टी अध्यक्ष बनी रहेंगी। - पार्टी का संविधान, संगठन और केंद्रीय नेतृत्व उनके नियंत्रण में रहेगा। - वे नए प्रदेश अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष और संगठनात्मक समितियां बना सकती हैं। सवाल 3: ममता बनर्जी और उनका गुट क्या कर सकता है? जवाब: बागी विधायकों के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। ममता बनर्जी बागी विधायकों को निष्कासित कर सकती हैं। फिलहाल दो विधायकों ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को निकाल चुकी हैं। - दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई की मांग कर सकता है। - स्पीकर और कोर्ट दोनों के सामने चुनौती दे सकता है। सवाल 4: यदि विवाद 'असली TMC कौन' तक पहुंचता है तो जवाब: मामला चुनाव आयोग के पास जाएगा। - चुनाव चिन्ह और पार्टी पर अधिकार का विवाद खड़ा हो सकता है। - यही रास्ता शिवसेना और NCP के मामलों में अपनाया गया था। TMC से अलग गुट बनाने वाले दो बड़े चेहरे… अधीर रंजन बोले- कांग्रेस तोड़ने वाली TMC आज खुद बिखर गई कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी- इतिहास खुद को दोहरा रहा है। 2016 के बाद टीएमसी ने कांग्रेस के विधायकों को तोड़ने के लिए दबाव और लालच की राजनीति की थी। आज वही टीएमसी खुद टूटने की स्थिति में पहुंच गई है। पहले ममता बनर्जी राजनीतिक दल-बदल की अंपायर-रेफरी थीं, लेकिन अब यह भूमिका बीजेपी निभा रही है। भाजपा नेता दिलीप घोष- मैंने पहले कहा था चुनाव हारने के बाद पार्टी टूट जाएगी। टीएमसी एक फैमिली पार्टी बन गई थी, इसलिए कई नेता असंतुष्ट थे लेकिन खुलकर सामने नहीं आ पा रहे थे। वंशवादी राजनीति खत्म होनी चाहिए और टीएमसी उसी दिशा में है। भविष्य में पार्टी में सिर्फ ममता और अभिषेक बनर्जी रह जाएंगे। AJUP नेता हुमायूं कबीर- टीएमसी संकट के लिए ममता बनर्जी की नेतृत्व शैली जिम्मेदार है। 2020 में अभिषेक बनर्जी को आगे बढ़ाकर वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी की गई, जिससे पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ा। चुनाव हारने और सत्ता गंवाने के बाद टीएमसी में टूट होना तय था। विधायकों के अलावा कुछ सांसद भी उनसे नाराज हैं। ममता ने पार्टी कमेटियां भंग कीं पार्टी के भीतर बगावत के बीच ममता बनर्जी ने बुधवार को राज्य की सभी कमेटियों और फ्रंटल संगठनों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है। पार्टी अब पूरे संगठन का पुनर्गठन करेगी। फर्जी साइन की शिकायत करने पर निकाले गए थे 2 विधायक ममता बनर्जी ने TMC से 2 विधायक संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी को पार्टी से निकाल दिया था। दोनों ने स्पीकर से शिकायत की थी कि पार्टी ने शोभनदेव को नेता विपक्ष बनाने वाले प्रस्ताव में उनके उनके फर्जी साइन किए थे। साहा और बनर्जी का आरोप है कि यह शिकायत करने पर ही दोनों TMC से निकाले गए। अभी TMC पर काबिज नहीं हो पाएंगे बागी विधायक TMC के बागी विधायक नेता विपक्ष, चीफ व्हिप जैसे पद तो ले सकते हैं, लेकिन शिवसेना और एनसीपी की तरह पार्टी पर अधिकार अभी नहीं ले पाएंगे। अगर ऐसा होता है तो बड़े गुट के दावे पर चुनाव आयोग फैसला लेगा। मामला कोर्ट भी जा सकता है। हालांकि इसके लिए दो-तिहाई यानी 28 में से 19 लोकसभा सांसदों की भी जरूरत भी होगी। इसके अलावा संगठन के पदाधिकारियों का भी रुख महत्वपूर्ण होता है, इससे बचने के लिए ममता ने पहले ही सभी कमेटियां भंग कर दी हैं। यह मामला मुख्य रूप से दसवीं अनुसूची में दिए दलबदल कानून, पार्टी संगठन के संविधान और निर्वाचन आयोग के नियमों से तय होता है। 91वें संविधान संशोधन (2003) के बाद कम से कम दो-तिहाई विधायक मूल पार्टी से अलग होने का निर्णय लेते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से छूट मिल सकती है। इसके बाद चुनाव आयोग यह जांच करता है कि पार्टी पर असली नियंत्रण किसका होगा। इसके लिए 4 पॉइंट तय हैं… महाराष्ट्र में पिछले 5 सालों में दो बड़ी पार्टियां टूटीं महाराष्ट्र में पिछले पांच सालों में दो बड़ी क्षेत्रीय पार्टियां टूट चुकी हैं। 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना का बड़ा गुट अलग हो गया, जबकि 2023 में अजित पवार के साथ NCP का एक बड़ा धड़ा अलग हो गया। दोनों मामलों में अलग हुए गुटों ने पार्टी और चुनाव चिह्न पर भी दावा किया, जिससे इसे महाराष्ट्र की नई दल-बदल राजनीति का उदाहरण माना जाता है। पिछले 12 दिन में हुए घटनाक्रम, जिनसे TMC में टूट के रास्ते बने ------------------------ बंगाल की राजनीति से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… ममता का दावा- TMC विधायकों पर भाजपा जॉइन करने का दबाव, पुलिस उन्हें डरा-धमका रही पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोमवार को फेसबुक पर वीडियो मैसेज जारी कर भाजपा और पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि पुलिस TMC विधायकों पर पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होने का दबाव बना रही है। ममता ने दावा किया कि कुछ विधायकों और सांसदों को डराने-धमकाने या रिश्वत देकर TMC को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। पढ़ें पूरी खबर…

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