राहुल की पीठ पर सवार आरएसएस का बेताल, कैसे निपटेगी कांग्रेस?
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने आराध्य शिव के दर्शन करने कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जा रहे हैं. याद करिए लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान राहुल गांधी का भाषण जिसमें उन्होंने कहा था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उन्हें शिव और हिंदू होने का मतलब सिखाया. जो जहर संघ-भाजपा में उनको लेकर है, वो उनके (राहुल) अंदर संघ-भाजपा के लिए तनिक भी नहीं है. एक तरह से राहुल ने खुद को नफरत के जहर को आकंठ करने वाले नीलकंठ की संज्ञा भी दे दी. तो वहीं इशारों-इशारों में संसदीय मर्यादा का पालन करते हुए संघ और भाजपा पर हमला भी बोल दिया.
एक वाकया है दिल्ली के जवाहर भवन में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की याद में देश के बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों का जुटान हुआ. जिसमें कांग्रेस के क्रियाकलापों से इत्तेफाक न रखने वाले सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल थे. राहुल गांधी दर्शक दीर्घा में बैठे थे. एक-एक करके तमाम बुद्धीजीवि कांग्रेस की आलोचना भी कर रहे थे और आरएसएस को न रोक पाने में कांग्रेस की नाकामी भी याद दिला रहे थे.
राहुल गांधी ने कांग्रेस की आलोचनाओं पर तो कुछ नहीं कहा, लेकिन जब बात आरएसएस की आई तो दर्शक दीर्घा से हाथ खड़ा करके बोले कि आप लोग आरएसएस से अपने विचार और लेखनी के माध्यम से लड़ते हो. लेकिन हमारे लाखों कार्यकर्ता आरएसएस से हर पल, हर वक्त कहीं न कहीं संघर्ष कर रहे होते हैं.
आरएसएस को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के विचार किसी से छिपे नहीं हैं. देश का कोई भी मुद्दा हो राहुल आरएसएस को उस मुद्दे से जोड़कर तीखा हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ते.
राहुल ने कब-कब आरएसएस को क्या-कया कहा?
अक्टूबर 2010 में, जब राहुल कांग्रेस के महासचिव थे तब उन्होंने कहा था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया (सिमी) में कोई अंतर नहीं है.
लेकिन आरएसएस पर राहुल का सबसे ज्यादा चर्चित भाषण था, 6 मार्च, 2014 की एक रैली का, जिसमें उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या के लिए आरएसएस को जिम्मेदार बताया था. इस भाषण पर भिवंडी, महाराष्ट्र में राहुल पर मानहानि भी चल रहा है. और कोर्ट के निवेदन के बावजूद राहुल अपने बयान पर कायम रहते हुए मामले का सामना करने पर अड़े हैं.
वहीं कांग्रेस द्वारा आयोजित ओबीसी सम्मेलन में राहुल ने कहा था कि, बीजेपी के 4-5 ओबीसी सांसद एक बार उनके पास आए तो उन्होंने पूछा कि क्या हो रहा है? तब उन लोगों ने कहा- 'मेरे जैसा बेवकूफ कोई नहीं है, मैं इनको लाया, मैंने इनको प्रधानमंत्री बनाया लेकिन अब ये ही मेरी बात नहीं सुन रहे हैं.' उन्होंने कहा कि बात सिर्फ आरएसएस की सुनी जाती है.' राहुल ने कहा कि हिंदुस्तान बीजेपी-आरएसएस का गुलाम बन कर रह गया है.
जुलाई में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने बीजेपी शासित मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ राज्य का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया था कि यहां की राज्य सरकारें सरकारी खजाने का पैसा चोरी से शिशु मंदिर स्कूलों सहित आरएसएस की तमाम संस्थाओं को दान कर रही हैं.
अभी कुछ ही दिन पहले इंग्लैंड दौरे पर गए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लंदन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर बड़ा हमला बोला. उन्होंने आरएसएस की तुलना मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड से कर दी. उन्होंने कहा कि आरएसएस की सोच मुस्लिम ब्रदरहुड जैसी है. आरएसएस भारत की प्रकृति को बदलने की कोशिश कर रहा है. अन्य पार्टियों ने भारत की संस्थाओं पर कब्जा करने के लिए कभी हमला नहीं किया, लेकिन आरएसएस कर रहा है.
आरएसएस पर हमला क्यों कर रहे हैं राहुल?
दरअसल आरएसएस हमेशा से दीर्घकालिक रणनीति पर काम करता है. आज की तारीख में संघ देश के बड़े निर्णायक फैसलों को प्रभावित करने की हैसियत रखता है. तो वहीं सरकार और सरकार के बाहर संघ से जुड़े लोग अहम ओहदों पर काबिज हैं. आरएसएस पर अक्सर एकांतिक होने का तमगा लगता है, जिसमें किसी अन्य विचारधारा की कोई जगह नहीं है. अपनी इसी छवि से बाहर निकलने के लिए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत बड़े-बड़े शहरों में विचारधारा के बारे में लोगों को अवगत करा रहे हैं. ऐसा ही एक कार्यक्रम कुछ दिनों पहले मुंबई में हुआ था जिसमें संघ से ताल्लुक नहीं रखने वाले नेता भी शामिल हुए थे.
आजादी के बाद से देश की वैचारिक धुरी गांधीवादी समावेशी राष्ट्रीयता के इर्द गिर्द घूमती रही. गांधी की हत्या के बाद पंडित नेहरू ने इसे आगे बढ़ाया. तमाम मतभेदों और मनभेदों के बावजूद बीजेपी को छोड़कर चाहे वाम हो या समाजवादी विचारधारा कम से कम गांधी और नेहरू के विचारों के नाम पर सब एक थे. कांग्रेस की सत्ता से पकड़ कमजोर होने के बाद आरएसएस को विस्तार का मौका मिला और आज देश में 84000 शाखाएं संचालित की
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