अय्यर के लेटर का थरूर ने दिया जवाब:कहा- मेरी देशभक्ति पर सवाल उठाना गलत; अय्यर ने लिखा था- क्या आप मोदी की कृपा चाहते हैं

कांग्रेस के दो दिग्गज नेताओं शशि थरूर और मणि शंकर अय्यर के बीच तनाव और बढ़ गया है। थरूर ने गुरुवार को अय्यर के ओपन लेटर का जवाब ओपन लेटर से दिया है। थरूर ने कहा है कि विदेश नीति पर मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन इससे किसी की नीयत या देशभक्ति पर सवाल उठाना ठीक नहीं है। मणि शंकर अय्यर ने 10 मार्च को अपने लेटर में विदेश नीति पर थरूर के रुख की आलोचना की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि थरूर ने अमेरिका-इजराइल और ईरान से जुड़े मुद्दों पर भारत के नैतिक रुख को कमजोर किया है। उन्होंने कहा कि भारत को शक्तिशाली देशों के दबाव में चुप नहीं रहना चाहिए और गांधी-नेहरू की नैतिक राजनीति से प्रेरणा लेनी चाहिए। अय्यर ने लेटर में थरूर से पूथा- क्या आप सचमुच नरेंद्र मोदी की कृपा पाने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि वे आपको वह लाभ दे सकते हैं जो विपक्ष आपको नहीं दे सकता? थरूर ने जवाब में कहा- मैंने अब तक सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया नहीं दी थी, लेकिन अब जवाब देना जरूरी हो गया था। थरूर का लेटर पढ़िए- लोकतंत्र की खूबी यही है कि लोग अलग-अलग राय रख सकते हैं। असहमति होना गलत नहीं है। लेकिन सिर्फ इसलिए कि कोई विदेश नीति को थोड़ा अलग तरीके से देखता है, उसकी नीयत या देशभक्ति पर सवाल उठाना ठीक नहीं है। आपने मेरे विचारों और मेरे चरित्र के बारे में जो सार्वजनिक टिप्पणी की है, उसका जवाब देना जरूरी हो गया है।मैंने हमेशा अंतरराष्ट्रीय मामलों को भारत के राष्ट्रीय हित के नजरिए से देखा है। मेरे लिए भारत की सुरक्षा, भारत की अर्थव्यवस्था और दुनिया में भारत की इज्जत सबसे ऊपर है। दुनिया की राजनीतिक हकीकत को समझना और भारत के हितों को ध्यान में रखकर फैसला लेना कोई “मोरल सरेंडर” नहीं है — यह जिम्मेदार स्टेटक्राफ्ट है। भारत की विदेश नीति हमेशा principle और pragmatism दोनों का संतुलन रही है। Jawaharlal Nehru की Non-Alignment policy से लेकर आज की multi-alignment diplomacy तक भारत का मकसद हमेशा एक ही रहा है, अपनी संप्रभुता की रक्षा करना और दुनिया में न्याय की बात करना। संसद में हो या संसद के बाहर, मेरा रिकॉर्ड इसी संतुलन को दिखाता है।देशभक्ति पर किसी एक पीढ़ी का अधिकार नहीं है। और न ही गांधी जी या नेहरू जी को समझने का अधिकार किसी एक समूह के पास है। असली सम्मान यही है कि उनके विचारों को आज के समय की हकीकत के साथ समझकर लागू किया जाए। इतिहास में भी भारत ने कई बार ऐसा किया है कि किसी देश की गलत कार्रवाई को तुरंत सार्वजनिक रूप से नहीं ललकारा, क्योंकि हमारे अपने राष्ट्रीय हित उससे जुड़े हुए थे। उदाहरण के लिए, सोवियत यूनियन के साथ हमारे रिश्ते इतने महत्वपूर्ण थे कि हंगरी, चेकोस्लोवाकिया और अफगानिस्तान के मामलों में भी भारत ने बहुत संतुलित रुख अपनाया।आज भी खाड़ी देशों के साथ भारत के बहुत बड़े हित जुड़े हैं। लगभग 200 अरब डॉलर का व्यापार, हमारी एनर्जी सिक्योरिटी और करीब 90 लाख भारतीय वहां काम कर रहे हैं। ऐसे में विदेश नीति बनाते समय इन सब बातों को ध्यान में रखना पड़ता है।यथार्थ को समझना किसी के आगे झुकना नहीं होता। आज अमेरिका में ऐसी सरकार है जो अंतरराष्ट्रीय कानून को हमेशा उसी तरह प्राथमिकता नहीं देती जैसे हम देना चाहते हैं। लेकिन अगर हम उसे खुलकर चुनौती देते हैं तो उसके परिणाम भी हो सकते हैं।अपने हाल के Indian Express लेख में मैंने साफ लिखा है कि यह युद्ध अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है, इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं और इसे तुरंत खत्म होना चाहिए। लेकिन साथ ही मैंने यह भी कहा कि अमेरिका के साथ हमारे कई महत्वपूर्ण हित जुड़े हैं, उन्हें खतरे में डालना समझदारी नहीं होगी। विदेश नीति आखिरकार राष्ट्रीय हित के बारे में ही होती है, केवल भाषण देने या दिखावे की राजनीति करने के बारे में नहीं। मेरी विदेश यात्राओं को लेकर जो आरोप लगाए गए हैं, वे बिल्कुल बेबुनियाद हैं। ऑपरेशन सिंदूर को छोड़कर मेरी बाकी विदेश यात्राएं मेरी प्राइवेट कैपेसिटी में होती हैं। न उन्हें सरकार आयोजित करती है, न सरकार उनका खर्च उठाती है। दुनिया भर के कई विश्वविद्यालय और संस्थान मुझे बुलाते हैं, जितने निमंत्रण आते हैं, उनमें से ज्यादातर को मैं अपने काम के कारण स्वीकार भी नहीं कर पाता।जहाँ तक क्षेत्रीय राजनीति की बात है, मेरे विचार सालों से एक जैसे रहे हैं।मैंने हमेशा Israel और Palestine के बीच two-state solution का समर्थन किया है। और यह भी कहा है कि पाकिस्तान में अक्सर ऐसा लगता है कि वहाँ सेना के पास देश है, न कि देश के पास सेना। ऑपरेशन सिंदूरके बाद जब हमने दुनिया में भारत का पक्ष रखा, तो मेरा संदेश साफ था — "भारत बुद्ध और गांधी की भूमि है। हम शांति चाहते हैं। लेकिन शांति का मतलब कमजोरी नहीं होता। अगर आतंकवाद हमारे लोगों की जान लेगा, तो भारत मजबूती से जवाब देगा।"सबरीमाला के मुद्दे पर भी आपकी आलोचना मुझे थोड़ी अजीब लगी। एक तरफ आप मुझे “गलत विचारों” के लिए कोसते हैं, दूसरी तरफ उसी मुद्दे पर पार्टी के निर्णय के साथ खड़े होने के लिए भी आलोचना करते हैं। मेरी जन्मतिथि को लेकर की गई टिप्पणी भी इस बहस से जुड़ी नहीं है। महात्मा गांधी का सम्मान करने के लिए यह जरूरी नहीं कि किसी को उनकी गोद में खेलने का मौका मिला हो। मैंने गांधी जी और नेहरू जी पर काफी लिखा है और उनका सम्मान मेरे विचारों में गहराई से मौजूद है।विदेश नीति के तरीकों पर मतभेद होना स्वाभाविक है। लेकिन principled pragmatism को गलत समझना ठीक नहीं है।मेरा मानना है कि भारत को ऐसी राष्ट्रवादी सोच की जरूरत है जो नैतिक मूल्यों और वास्तविक दुनिया की राजनीति, दोनों को साथ लेकर चले।आपने कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में मेरा समर्थन किया, उसके लिए मैं आपका आभारी हूं।और जब आपको पार्टी से निलंबित किया गया था, तब मैंने भी आपके समर्थन में आवाज उठाई थी। मुझे खुशी है कि वह निर्णय बाद में ठीक किया गया।आपने अपने पत्र के अंत में “रास्ते अलग होने” की बात कही। सच यह है कि आपरेशन सिंदूर पर मेरे बोलने के बाद से ही आप लगातार मेरे बारे में कई टिप्पणियां कर रहे थे। मैंने अब तक सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया नहीं दी थी, लेकिन आपकी हाल की टिप्पणियों के बाद जवाब देना जरूरी हो गया, इसलिए दे रहा हूं। अय्यर ने लिखा था- थरूर के लिए गांधी और नेहरू सिर्फ नाम अय्यर ने लेटर के जरिए भारत के विदेश नीति पर थरूर के पक्ष की आलोचना की थी। उन्होंने लिखा- ऐसा लगता है कि आपने रूस और चीन जैसे दो बड़े शक्तिशाली देशों के बारे में भी नहीं सुना, जो ईरान के लोगों पर हो रहे हमले की क्रूरता, संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उल्लंघन और ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या जैसी बर्बर घटनाओं पर खुलकर बोल रहे हैं—जैसा नेहरू के दौर में भारत करता था और करता। अय्यर का लेटर पढ़िए… कल रात (शुक्रवार, 6 मार्च 2026) आपके जवाबों ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। ये सवाल इजराइल की तरफ से अमेरिका और व्यापक रूप से पश्चिम के साथ मिलकर ईरान पर चलाए जा रहे अवैध और पापपूर्ण युद्ध से जुड़े थे। मैंइतना विचलित हो गया कि मुझे नींद नहीं आई और सुबह 3 बजे उठकर आपको यह खुला पत्र लिख रहा हूं।मैंने अपने राजनीतिक करियर को दांव पर लगाकर न केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद के चुनाव में आपको वोट दिया, जबकि मुझे पता था कि आप बुरी तरह हार जाएंगे, बल्कि अगले दिन द इंडियन एक्सप्रेस में यह भी लिखा कि विजेता मल्लिकार्जुन खड़गे को उदारता दिखाते हुए आपके लोकतांत्रिक अधिकार का सम्मान करना चाहिए, भले ही उन्हें गांधी परिवार और जी-23 के बचे-खुचे नेताओं का पूरा समर्थन मिला हुआ था। मैंने जोरदार तरीके से तर्क दिया कि एक परिपक्व राजनीतिक दल के अनुरूप, कांग्रेस संगठन में आपको सम्मानजनक स्थान दिया जाना चाहिए ताकि आपकी कई प्रतिभाओं का पूरा उपयोग हो सके।इसके परिणामस्वरूप गांधी परिवार और खड़गे तब से मुझसे मिलने से इनकार करते रहे हैं। फिर भी मुझे नैतिक आधार पर अपनी बात सही लगी। अब मुझे लगता है कि मुझे किसी अधिक योग्य उद्देश्य का समर्थन करना चाहिए था।कल रात “जिसकी ताकत उसकी बात” जैसी सोच का आपका शर्मनाक समर्थन मुझे भयभीत कर गया।आप कहते हैं कि आप अच्छी तरह समझते हैं कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर अमेरिका का सामना करने से क्यों बेहद सतर्क रहते हैं—क्योंकि भारत, खासकर उसकी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले “परिणामों” का डर है।स्थायी समिति के चेयरमैन के रूप में आप विदेश नीति पर निर्णय लेने का अधिकार सरकार को सौंप देते हैं, क्योंकि आपके अनुसार पूरी जानकारी केवल सरकार के पास होती है।तो फिर आप अपने इस उच्च पद पर कर क्या रहे हैं? आप अमेरिकी प्रभाव को स्वीकार करने के लिए “यथार्थवाद” की बात करते हैं।ऐसा लगता है कि आपने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की उस पुकार के बारे में न तो सुना है और न ही उस पर ध्यान दिया है, जिसमें कहा गया था—“अहंकारी शक्ति के आगे कभी घुटने मत टेकना।” आप कहते हैं कि बहुत कम विकासशील देशों में अमेरिका के खिलाफ खुलकर बोलने का साहस है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र के सौ से अधिक सदस्य देशों ने गाजा में हुए नरसंहार की कड़ी निंदा की है, और इस तरह उन देशों की भी आलोचना की है जो इसमें सहभागी हैं, जैसे अमेरिका।साथ ही ऐसा लगता है कि आप गुरुदेव के “एकला चलो रे” के संदेश से भी अनभिज्ञ हैं, जो नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति की आधारशिला था।ऐसा लगता है कि आपने रूस और चीन जैसे दो बड़े शक्तिशाली देशों के बारे में भी नहीं सुना, जो ईरान के लोगों पर हो रहे हमले की क्रूरता, संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उल्लंघन और ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या जैसी बर्बर घटनाओं पर खुलकर बोल रहे हैं—जैसा नेहरू के दौर में भारत करता था और करता। आप चाहते हैं कि भारत इस अपराध पर इसलिए चुप रहे क्योंकि अमेरिका की सेना हमसे अधिक ताकतवर है? शर्म की बात है! मैंने अपने मन में बहुत खोजा कि आपकी इस सिद्धांतहीन, अनैतिक और लेन-देन आधारित सार्वजनिक नीति—खासकर विदेश नीति—की सोच का मूल कारण क्या है।और मुझे जो एकमात्र कारण समझ आया, वह यह है कि आपका जन्म 1956 में हुआ, मुझसे 15 साल बाद, इसलिए आप महात्मा गांधी और पंडित नेहरू के प्रत्यक्ष प्रभाव के दायरे से बाहर रहे। वे आपके लिए केवल नाम भर थे।लेकिन मेरे लिए वे जीवित स्मृतियां थीं।जब मैं केवल छह साल का था, तब महात्मा गांधी ने अपने शहीद होने से कुछ हफ्ते पहले मुझे और मेरे पांच साल के छोटे भाई को गोद में उठाया था और मैंने उन्हें कहते सुना—“ये मेरे आंखों के चांद और सूरज हैं।”मेरा नैतिक संसार हमेशा महात्मा गांधी के सिद्धांतों से ही प्रेरित रहा है।उन्होंने मिट्टी से हमें इंसान बनाया।लेकिन शायद इससे भी अधिक प्रभाव जवाहरलाल नेहरू का रहा। जब भारत को स्वतंत्रता मिली और वे देश के पहले प्रधानमंत्री बने, तब मैं छह साल का था।और जब उनका निधन हुआ, तब मैं 23 साल का था और भारतीय विदेश सेवा में प्रशिक्षु था। अपने पूरे युवावस्था के वर्षों में मैं उस नैतिक छाया में रहा जो पंडितजी ने इस नए राष्ट्र पर डाली थी।जब मैंने नेहरू की विदेश नीति पर आपकी तीखी आलोचना पढ़ी, तब मुझे हमारे बीच की पीढ़ीगत दूरी समझ लेनी चाहिए थी—लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाया।मुझे लगा कि आप केवल छोटी-छोटी कमियां निकाल रहे हैं।लेकिन वास्तव में आप विदेश नीति पर एक वैकल्पिक और पूरी तरह अनैतिक तथा लेन-देन आधारित दृष्टिकोण पेश कर रहे थे।उम्र में 15 साल का अंतर कितना बड़ा फर्क पैदा कर सकता है!जब देश स्वतंत्रता के लिए लड़ रहा था, तब भी आपके जैसे कई लोग थे।उन्हें वी.एस. नायपॉल ने तीखे अंदाज में “जमशेद से जिमी” कहा था—यानी शासन के साथ सहयोग करने वाले लोग।बेशक, अब जब साम्राज्यवादी जा चुके हैं, तो आप साम्राज्य की अतिरेकताओं के एक बेहद जानकार आलोचक बनकर उभरे हैं।ऑक्सफोर्ड यूनियन में आपका प्रदर्शन सचमुच शानदार था, एक ऐसा भाषण जिसका कोई मुकाबला नहीं था।लेकिन सच्चाई यह है कि जब आप ऑक्सफोर्ड गए, तब तक अंग्रेज जा चुके थे, इसलिए आपको अपनी आवाज मिल गई।लेकिन अमेरिकी अभी गए नहीं हैं, इसलिए आप उनके सामने झुकते हैं।यही होता है जब जयशंकर जैसी “व्यावहारिकता” नैतिक भावना पर हावी हो जाती है। और आप भी उसी सोच के साथ खड़े दिखाई देते हैं।क्या आप सचमुच नरेंद्र मोदी की कृपा पाने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि वे आपको वह लाभ दे सकते हैं जो विपक्ष आपको नहीं दे सकता?हालांकि इस बात के काफी सबूत हैं कि स्थायी समिति के चेयरमैन के रूप में विदेश यात्राओं के दिखावे और वैभव में आपकी खुशी का यही कारण है, फिर भी मैं इस विचार से सहमत नहीं हूं।मैं इस विचार से इसलिए सहमत नहीं हूं क्योंकि आप अपने हर भाषण और कार्रवाई के लिए हमेशा कोई न कोई ऊंचा देशभक्ति का कारण पेश करते हैं।उदाहरण के तौर पर, पहलगाम के बाहर घास के मैदान में हुए आतंकी हमले के बाद आपने खुद को देश का प्रवक्ता बनना अपना देशभक्तिपूर्ण कर्तव्य बताया।पूरी दुनिया, पाकिस्तान सहित, उस हमले की निंदा कर रही थी।लेकिन उन्होंने पाकिस्तान की निंदा नहीं की।आपका राष्ट्रीय कर्तव्य यह था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान को “आतंकवाद का अपराधी, वित्तपोषक, हथियार आपूर्तिकर्ता और प्रायोजक” घोषित करे और उसे सजा दिलाई जाए—जैसा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सर्वसम्मत प्रेस बयान में कहा गया था।आप और आपके सहयोगी हर जगह जाते रहे और अपनी उपलब्धियों का खूब बखान करते रहे।लेकिन क्या यह सच नहीं है कि केवल दो देशों—आतंकी तालिबान शासित अफगानिस्तान और घोषित युद्ध अपराधी के नेतृत्व वाले नरसंहारकारी इज़राइल—ने ही आपके तर्क का समर्थन किया?संयुक्त राष्ट्र के 193 में से 191 सदस्य देशों ने पाकिस्तान का नाम लेकर उसकी निंदा करने से इनकार कर दिया है, और पाकिस्तान का फील्ड मार्शल तो अमेरिकी राष्ट्रपति का खुलकर घोषित “पसंदीदा फील्ड मार्शल” है—जिसके सामने आप चाहते हैं कि हमारा देश झुके।क्या आपने कभी सार्वजनिक रूप से, या खुद से भी, यह स्वीकार किया है?बल्कि “यस मिनिस्टर” के हैकर की तरह, ऐसा लगता है कि आप “अपनी मौजूदगी पर तभी विश्वास करते हैं जब उसके बारे में अखबारों में पढ़ते हैं।”महात्मा गांधी से भी गलतियां हुई थीं और उन्होंने खुद को आखिरकार एक “साधारण व्यक्ति” ही बताया था।यहां तक कि उन्होंने अपनी एक बड़ी गलती को “हिमालयन ब्लंडर” कहकर खुद की कड़ी आलोचना की थी।क्या आप भी ऐसा करने के लिए तैयार हैं?अगर नहीं, तो यह निंदनीय है। आप केवल सुर्खियां चाहते हैं। यह कोई सम्मानजनक उद्देश्य नहीं है। जहां तक धर्मनिरपेक्षता का सवाल है, कई साल पहले दोपहर के भोजन के दौरान हुई बातचीत में ही मुझे आप पर संदेह होने लगा था।इसके बाद मैंने देशभक्ति और राष्ट्रवाद पर लिखी आपकी मोटी किताब का गहराई से अध्ययन किया और ओपन पत्रिका में 8,000 शब्दों की समीक्षा लिखी।तब मुझे लगा था कि हम तार्किक तरीके से असहमति पर सहमत हो सकते हैं।लेकिन सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म वाली महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आपके खारिज करने के बाद मेरी आंखों से पर्दा हट गया।मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि सेंट स्टीफेंस के पढ़े-लिखे, आधुनिक सोच वाले और आइवी लीग कॉलेज से पोस्टग्रेजुएट व्यक्ति इतने पिछड़े विचार रख सकते हैं कि वे एक ऐसे लैंगिक भेदभावपूर्ण और स्त्री-विरोधी प्रथा का समर्थन करें जो महिलाओं को उनके प्राकृतिक शारीरिक कार्य के कारण दंडित करती है।लेकिन वही शुरुआती संकेत थे कि आप वास्तव में “हम में से एक” नहीं हैं।अब एक ऐसे शासन के प्रति आपकी गहरी सहानुभूति, जो सांप्रदायिक दुर्भावना से भरा है, ने इस बात पर अंतिम मुहर लगा दी है।यहीं से हमारे रास्ते अलग हो जाते हैं।

Comments


Popular posts from this blog

तिलस्वा महादेव का दान पात्र खोला , 48हजार 229 रुपए निकले

गैस की किल्लत, ₹900 वाला सिलेंडर ₹1800 में मिल रहा:कॉमर्शियल के ₹4 हजार वसूले जा रहे; इंडक्शन की डिमांड 50% बढ़ी

जन्मकल्याणक महोत्सव 30 दिसम्बर को  चवलेश्वर पार्श्वनाथ तीर्थ चेनपुरा मे मनाया जाएगा